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samajwadi party akhilesh yadav could mistake in bumper entry of swami prasad maurya type leaders – India Hindi News

भाजपा की यूपी सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में जाने की काफी चर्चाएं हो रही हैं। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने उनकी एंट्री को अगड़ा बनाम पिछड़ा के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है। इसके साथ ही उन्होंने ‘मेला होबे’ लिखते हुए कुछ और नेताओं के भी स्वागत की बात कही है। साफ है कि वह भाजपा से आने वाले नेताओं को लेने के लिए तैयार हैं। उसे वह एक बड़ी बढ़त के तौर पर प्रचारित करना चाहते हैं, लेकिन यह नतीजे आने तक यह बातें अफसाना ही हैं। दरअसल यूपी की राजनीति की समझ रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि अखिलेश यादव भाजपा से आए नेताओं की ताबड़तोड़ एंट्री कराके बंगाल में भाजपा जैसी गलती ही दोहरा रहे हैं।

चुनाव से पहले भाजपा में आए थे 140 नेता, पर माहौल बना नहीं

बंगाल में चुनाव से पहले भाजपा ने बड़ा माहौल बनाया था। टीएमसी से करीब 140 नेताओं ने भाजपा का दामन थामा। पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी समेत कई दिग्गज नेता इनमें शामिल थे। कुल ऐसे 35 विधायक थे, जो टीएमसी से भाजपा में आए थे। इसके चलते भाजपा को टीएमसी से बराबर की टक्कर में माना जाने लगा था। लेकिन नतीजे आए तो बड़ा अंतर सामने था। फिर वही नेता खुद टीएमसी में ही चले गए। उनके चुनाव से पहले टूटने की वजह यह थी कि टीएमसी में उनके सामने टिकट कटने का खतरा था। ऐसे में वह भाजपा में चले गए और फिर जीत या हार के बाद ज्यादातर सत्ताधारी दल में ही लौट आए। 

बंगाल में भाजपा ने की यही गलती और लगा करारा झटका

यहां तक कि सीटें जीतने के मामले में भाजपा के लिए फिसड्डी साबित हुए। भाजपा ने टीएमसी से आए 19 विधायकों को चुनाव में उतारा था, लेकिन इनमें से 6 को ही जीत मिल पाई थी। इसकी वजह यह थी कि ये नेता अपने साथ ऐंटी-इनकम्बेंसी लेकर आए थे। जनता इनसे नाराज थी और टीएमसी इनमें से ज्यादातर को टिकट देने के मूड नहीं थी। ऐसे में टीएमसी के लिए यह स्थिति आरामदायक रही और उसके ऐंटी-इनकम्बैंसी से बचते हुए नए नेताओं को मौका दिया और बहुमत हासिल किया। भाजपा को लेकर भी कहा जा रहा है कि यूपी में वह बड़ी संख्या में टिकट काटने की तैयारी में है। इसकी वजह से भी तमाम नेता भाजपा से पलायन कर रहे हैं। 

बड़ी संख्या में टिकट काटेगी भाजपा, लोकल ऐंटी-इनकम्बैंसी से निपटने की तैयारी

भाजपा के सूत्रों का भी कहना है कि पार्टी को अपने जनाधार को लेकर कोई डर नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंत्रियों और विधायकों से जनता में नाराजगी है। ऐसे में यदि ऐसे तमाम विधायक सपा ले जाती है और उन्हें टिकट देती है तो संभव है कि स्थानीय लोगों के गुस्से के चलते वह सपा से भी हार जाएं। हां, एक बात से भाजपा भी थोड़ी आशंकित है कि ओबीसी और दलित विधायकों के ज्यादा पलायन के चलते चुनाव का नैरेटिव कहीं अगला बनाम पिछड़ा न हो जाए। 

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